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अन्तराय कर्म
त्याग ग्रहण से भिन्न है, सदा सुखी भगवान।
धर्मदास क्षुल्लक कहे, स्वानुभव परमान॥
जैसे गरीब को देने हेतु राजा भण्डारी को आदेश दे कि “इसे एक हजार रूपये दो”, परन्तु भंडारी कोई कारण बताकर उसे पैसे नहीं देता। ठीक उसीप्रकार अंतरंग में तो विषय – भोग भोगने की अथवा त्यागने की तीव्र आकांक्षा हो परन्तु ये अंतराय नामक कर्म भण्डारी की भाँति उसे भोगने अथवा छोडने नहीं देता। निश्चय से आत्मा ने क्या ग्रहण किया और क्या त्यागा? इसका विचार ही भेदविज्ञान में सहायी है।
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