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आयु कर्म
खण्डन मण्डन आयु नाश, भये सिद्ध परमालय पास।
अचलायू सम अचल अभेद, लीन भये निज रूप अखेद॥
पाँव में पडा बन्धन व्यक्ति को चलने की सामर्थ्य वाला होते हुए भी एक ही जगह तब तक रोक कर रखता है जब तक वह बंधन टूट ना जाये। वास्तव में बंधन में तो अपनी योग्यता से ही छूटेगा परन्तु उस निश्चित काल तक के लिये करने योग्य और नहीं करने योग्य का विचार व्यक्ति स्वयं कर सकता है। ये आयु कर्म पैर में पडे उस बेडी के समान ही है, जब तक ये बंधन है देह-त्याग नहीं होगा परन्तु निश्चय से तो जीव अमूर्तिक है और बंधन तो मूर्तिक देह को ही बांधता है। अमूर्तिक आत्मा तो कभी बंधा ही नही, इस स्वरूप का विचार ही आत्मानुभव का जनक है।
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