After receiving permission from Bharata, Bāhubalī embarked on his journey towards the forest. He did not look back, for the one who has looked within himself no longer seeks to see anything else. However, one more mishap occurred. While Bāhubalī was heading towards the forest, he overheard two kings conversing. One king said, "Bāhubalī has renounced everything, but where will he go?" The other responded, "Brother! Into the forest! Where else?" The first king said again, "Brother, I know that Bāhubalī is heading towards the forest. But the king and his kingdom he disrespectfully abandoned, Emperor Bharata and his dominion span the entire realm. These forests, jungles, lakes, mountains, cities, and more belong to Emperor Bharata. Hence, Bāhubalī will effectively be meditating, eating food, and living on the land owned by Emperor Bharata. The second king agreed and said, "Yes, brother, you are right. After all, this entire land belongs to Emperor Bharata."
After listening to this conversation, Bāhubalī continued his journey toward mount Kailāsa. There, he took Dīkṣā (vow of monkhood) and embraced monkhood. On the other hand, upon learning about Bāhubalī’s Dīkṣā, Emperor Bharata conveyed the news to all other family members. A somber atmosphere pervaded the palace; all the queens, Mother Sunanda and Mother Yashāsvatī cried and wished for Bāhubalī’s return and expressed their desires to meet him again. Emperor Bharata was also deeply saddened by his brother's departure. He cursed his fate and wondered about the pointlessness of worldly merits whose accumulation causes one’s relatives to abandon them.
Inspired by Bāhubalī's actions, his 8000 queens also decided to embrace āryika dīkṣā (vow of renunciation) and embraced the path of asceticism. Emperor Bharata, accompanied by his mothers, entered the city of Ayodhyā. A year passed, and Emperor Bharata spent a happy life ruling his kingdom. One day, a message arrived in the palace announcing that revered Jain monks Acharya Anantavīrya and Kaccha-Mahākaccha had attained Kevalajñāna (omniscient knowledge). Overwhelmed with joy, everyone was busy offering their prayers. At this moment, Emperor Bharata wondered why Bāhubalī had not yet achieved Kevalajñāna.” He boarded a flying chariot to resolve his query and reached Mount Kailāsa.
There, Emperor Bharata asked Lord Ādinātha about Bāhubalī and received a detailed account of the events that transpired on the battlefield. Filled with remorse after reviewing it, Bharata visited Munīndra Bāhubalī and humbly requested, "Oh, Gurudev! Oh, Yogindra! The thought tormenting your mind is unjustified. Let me address it right away. Oh, great one focused inward! No one owns the earth that you perceive to be owned by me. Countless kings and Emperors have ruled the entire earth in the past. Although I am ruling it currently, I am bound to lose it one day. After me, there will be countless more kings who will rule the earth. Therefore, do not let such an impious earth hinder your meditation. Oh! Great sage! Eradicate this thought swiftly from your mind and attain the supreme state."
Emperor Bharata's words effortlessly dissolved all the internal barriers of the great sage. In less than a muhurta, he attained Kevalajñāna. Praise be to Lord Bāhubalī swami!
मुनिराज बाहुबली शल्य निवारण – भरत से आज्ञा पाकर बाहुबली ने वन की ओर प्रस्थान किया, अब उन्होंने मुड कर नही देखा क्योंकि जो अपनी आत्मा को देख लेता है उसे अब कुछ और देखने की आवश्यक्ता नही रहती। परन्तु अभी एक दुर्घटना और हुई, बाहुबली जब वन की ओर गमन कर रहे थे तो उन्होंने दो राजाओं को बात करते हुए सुना वे कह रहे थे कि “अब बाहुबली ने सब त्याग तो दिया है, परन्तु वे जायेंगे कहाँ”, दूसरा बोलता है “भाई! वन में! और कहाँ?” पुनः दूसरा व्यक्ति कहता है कि “भाई! ये तो मैं जानता हूँ कि बाहुबली अब वन की ओर जा रहे हैं, परन्तु जिस राजा और उसके राज्य का इन्होंने तिरस्कार पूर्वक त्याग किया है, उस राजा अर्थात सम्राट भरत का आधिपत्य तो सम्पूर्ण पृथ्वी पर है, ये वन, जंगल, सरोवर, पर्वत, नगर आदि सभी षटखण्डाधिपति भरत के ही हैं, तब इस स्थिति में बाहुबली ध्यान, आहार, विहार भी भरत की ही भूमि पर करने जा रहे हैं।” दूसरा व्यक्ति भी सहमति जताते हुए कहता है कि “हाँ भाई! तुम सही कहते हो, आखिर यह सर्व भूमि भरत की ही तो है।” बाहुबली इन दोनों की बात सुनते हुए वन की ओर गमन करते हुए कैलाश पर्वत पर दीक्षा धारण कर मुनि अवस्था अंगीकार की। वहीं दूसरी ओर भरत ने जब यह संदेश अन्य सभी परिवारजनों को बताया तो वहाँ शोक का माहोल छा गया, सभी रानियाँ, माँ सुनन्दा, माँ यशस्वती सभी रोने लगे और बाहुबली से मिलने और उनके वापिस आने की कामना करने लगे। भाई के जाने से भरत भी अत्यधिक उदास थे, वे भी अपने भाग्य को कोसने लगे कि ये कैसा पुण्य जिसको पाने से सभी स्वजन छोड कर चले गये। बाहुबली से प्रेरित होकर उनकी आठ हजार रानियों ने भी आर्यिका दीक्षा व्रत अंगीकार करने का निर्णय लिया और भरत ने भी अपनी माताओं के साथ अयोध्या नगर में प्रवेश किया। एक वर्ष बीत गया, भरत चक्रवर्ती अपने राज्य में सुख पूर्वक जीवन व्यतीत कर रहे थे कि तभी महल में अनन्तवीर्य एवं कच्छ-महाकच्छ मुनिराज को केवलज्ञान प्राप्त होने की सूचना मिली, सभी अत्यंत हर्षित एवं भक्तिमग्न हुए कि तभी भरत को विचार आया कि बाहुबली को अभी तक केवलज्ञान की प्राप्ति क्यों नही हुई और इसी के समाधान हेतु वे विमानारूढ होकर कैलाश पर्वत पहुँचे और वहाँ भगवान आदिनाथ से बाहुबली के संबंध में प्रश्न किया और भगवान की वाणी में रणभूमि पर हुआ सारा वृत्तांत आगया। भरत को इसका अत्यंत खेद हुआ और वे बाहुबली मुनीन्द्र के समक्ष जा पहुँचे और नतमस्तक होकर उनसे निवेदन करने लगे कि “हे गुरुदेव! हे योगीन्द्र! आपके मन में जो शल्य है वह अकारण है। उसका निवारण मैं अभी कर देता हूँ। हे अन्तर्ध्यानी! जिस वसुधा को आप मेरी समझकर मन में शल्य लिये बैठे हैं, वह किसी की नही है। इस पृथ्वी को असंख्यात राजा-चक्रवर्ती भोग चुके हैं, वर्तमान में मैं भोग रहा हूँ लेकिन मुझसे भी ये एकदिन छूटने वाली है। मेरे बाद अनेकों राजा होंगे जो इसे भोगेंगे अतः इस वेश्यासदृश पृथ्वी के लिये आप अपने ध्यान में विघ्न ना लायें। हे महामुनिराज अपने मन से इस शल्य का निवारण शीघ्र कर परमात्म अवस्था को प्राप्त करें।” बस फिर क्या था, भरत के इन वचनों ने मुनीन्द्र के समस्त अन्तर्विकारों को निर्मूल कर दिया और अन्तर्मुहुर्त में उन्होंने केवलज्ञान को प्राप्त किया। बोलो भगवान बाहुबली स्वामी की जय…।