Title
दर्शनावरणीय कर्म –
ज्ञानभानु जिनराज, सर्व जगत के ऊपरे।
धर्मदास कहै सार, सो ही सुखको काज है॥
जिसप्रकार किले में जाने की सामर्थ्य व्यक्ति में अवश्य ही है परन्तु पहरेदार उसके शक्तिवान होते हुए भी उसे अन्दर नहीं जाने देता, उसे बाहर ही रोक लेता है उसीप्रकार जीव में सम्पूर्ण देखने की सामर्थ्य होते हुए भी पहरेदार की भाँति दर्शनावरणीय कर्म सम्पूर्ण वस्तु के देखने-जानने में आवरण बन जाता है, देखने नहीं देता।
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