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Title

Ishtopdesh Gatha 08

मोही, पर पदार्थ को अपना मानता है

वपुर्गृहं धनं दाराः पुत्रा मित्राणि शत्रवः ।

सर्वथान्यस्वभावानि मूढः स्वानि प्रपद्यते ॥८ ॥

पुत्र मित्र घर तन तिया, धन रिपु आदि पदार्थ।

बिल्कुल निज से भिन्न हैं, मानत मूढ निजार्थ॥८॥

अर्थ: हे जीव! ये शरीर, घर, धन, स्त्री, पुत्र, मित्र, शत्रु इत्यादि सभी अन्य स्वभाव को लिये हुए परद्रव्य हैं तथा उनके निमित्त से होने वाले विभाव-भाव भी तेरे स्वभाव से भिन्न है, तुझसे युक्त नहीं। तू मोहवश इन्हें निज जानकर इन्हीं में रत रहता है। अनादिकालीन मोहनीय कर्म के कारण ये अपने प्रतीत होते हैं परन्तु ये अपने नहीं।

इस सम्यग्ज्ञान का भान हुए बिना मूढ जीव मोहनीय कर्म के जाल में फंसकर दिन-रात इन्हीं की प्राप्ति और इन्हीं के पालन में अपना भव और भाव दोनों बिगाड लेता है।

Series

Ishtopdesh

Category

Paintings

Medium

Acrylic on Canvas

Size

48" x 36"

Orientation

Landscape

Artist

Manoj Sakale

Completion Year

01-May-2023

Gatha

8