Title
दुख का कारण: देह
दुःखसंदोहभागित्वं संयोगादिह देहिनाम्।
त्यजाम्येनं ततः सर्वं मनोवाक्कायकर्मभिः ॥२८॥
प्राणी जा संयोगतैं, दुःख समूह लहात।
यातें मन वाच काय युत, हूँ तो सर्व तजात ॥२८॥
अर्थः संसार में यह जीव देहादिक के संयोग के कारण भी घोर दुःखों को भोगता है। जिसका कारण मन-वचन-काया की प्रवृत्ति है। इसलिये निराकुलता के लक्ष्यी जीव को इन संबंधों से मुक्त होने हेतु मन-वचन-काय से इन संयोगों का त्याग करना अनिवार्य है। आत्मा मन-वचन-काय से भिन्न है इसप्रकार के अभ्यास से सुख रूप मोक्ष की प्राप्ति होती है। जो उस उपाय को जान लेता है वह तिर जाता है। मोक्षगामी के अंतरंग में तो मन-वचन-काय से भिन्न चैतन्य तत्त्व ही भासित होता है।
Series
Category
Medium
Size
Orientation
Artist
Completion Year
Gatha