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Title

Ishtopdesh Gatha 43

संस्कार स्व का ही

यो यत्र निवसन्नास्ते स तत्र कुरुते रतिम् ।

यो यत्र रमते तस्मादन्यत्र स न गच्छति ॥४३॥

जो जामें बसता रहे, सो तामें रुचि पाय।

जो जामें रम जात है, सो ता तज नहिं जाय ॥४३॥

अर्थः जो मनुष्य जिस नगरादिक में अपने स्वार्थ की सिद्धि होने से उसी स्थान पर निवासी बनकर रहने लग जाता है और उसमें आनन्द का अनुभव करने लगता है, उसे अब कहीं ओर जाने का विकल्प नहीं; अब नवीन स्थान की वांछा नहीं। किसी के बार-बार समझाने पर भी उस स्थान को छोडने का विकल्प नहीं उसीप्रकार जब योगीजनों को जगत से विरक्त शुद्धात्मा के देश में आत्मसुख का स्वार्थी ख्याल आता है तब वे अन्य किसी वस्तु अथवा सामग्री की ओर दृष्टि नहीं करते अपितु अपूर्व आनन्द का अनुभव होता रहने से उस की अध्यात्म के सिवाय दूसरी जगह प्रवृत्ति नहीं होती।

Series

Ishtopdesh

Category

Paintings

Medium

Acrylic on Canvas

Size

48" x 36"

Orientation

Landscape

Artist

Manoj Sakale

Completion Year

01-May-2023

Gatha

43