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सम्यग्ज्ञान की भावना
अविद्याभिदुरं ज्योतिः ज्योतिः परं ज्ञानमयं महत् ।
तत्प्रष्टव्यं तदेष्टव्यं तद्दृष्टव्यं मुमुक्षुभिः ॥४९॥
पूज्य अविद्या-दूर यह, ज्योति ज्ञानमय सार।
मोक्षार्थी पूछो चहो, अनुभव करो विचार ॥४९॥
अर्थः जगत में जिसप्रकार सूर्य ही एकमात्र प्रकाश का उद्योतक है, जिसकी उपस्थिति समस्त अंधकार को ध्वस्त कर देती है उसीप्रकार शुद्धात्मा के लिये अविद्या को दूर करने वाली, स्वार्थी को प्रकाशन करने वाली व इन्द्रादिक द्वारा पूज्य ज्ञान ज्योति ही एकमात्र उत्कृष्ट साधन है। मोक्ष के इच्छुक मुमुक्षु जीवों को गुरु आदिक से उसी के विषय में पूछना चाहिये, उसी की वांछा करनी चाहिये और उसे ही अनुभव में लाना चाहिये।
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Gatha