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मोक्ष की सेन जिनप्रतिमा में है - जैसे कोई पुरुष पाषाण-घातु-काष्ठ और चित्र की मूर्ति की बड़े प्रेमभाव से पूजा-भक्ति करता था; कारणवश पाषाण की मूर्ति तो खण्डित हो गई, धातुकी देवमूर्ति को कोई चोर चोरी करके ले गया, काष्ठ की देवमूर्ति अग्निमें जलकर भस्म हो गई तथा चित्र की मूर्ति मेघ, हवा व अनेक बार हाथों के स्पर्श से बिगड़ गई। अतः वह धातु-पाषाण आदि की मूर्ति का नष्ट होना आदि अनेक दूषण प्रत्यक्ष अनुभव में आते हुए देखकर स्वयं में स्वयंमय अपने स्वसम्यग्ज्ञानानुभवगम्य स्वभाव स्वरूप स्वयं को ही देव समझकर चुपचाप रहता है, उसी का अनुभव करता है।
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