Title
मोहनीय कर्म –
पर स्वभाव पररूप के, माने अपनो आप।
ये विकल्प सब छोडके, नये सिद्धगुण थाप॥
जैसे मदिरा पीने वाला स्व-पर का यथार्थ रूप नही पहिचानता, अनर्गल प्रलाप करता है, विवेकहीन होकर अपना सर्वस्व लुटाने को भी तत्पर हो जाता है। उसीप्रकार ये जीव भी मोहनीय कर्म के वशीभूत होकर आत्मस्वभाव एवं पर के भेद को नही पहिचानता। ये तन-धन-परिवार मेरे हैं, मैं इनका हूँ, ऐसा अनर्गल प्रलाप करता है, पर में एकत्व-ममत्व बुद्धि होने के कारण अपने आत्मवैभव को भी ठुकरा देता है, भव-भव में परिभ्रमण करता है।
Series
Category
Medium
Size
Orientation
Artist
Completion Year