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Title

Mohaniya Karma

मोहनीय कर्म

पर स्वभाव पररूप के, माने अपनो आप।

ये विकल्प सब छोडके, नये सिद्धगुण थाप॥

जैसे मदिरा पीने वाला स्व-पर का यथार्थ रूप नही पहिचानता, अनर्गल प्रलाप करता है, विवेकहीन होकर अपना सर्वस्व लुटाने को भी तत्पर हो जाता है। उसीप्रकार ये जीव भी मोहनीय कर्म के वशीभूत होकर आत्मस्वभाव एवं पर के भेद को नही पहिचानता। ये तन-धन-परिवार मेरे हैं, मैं इनका हूँ, ऐसा अनर्गल प्रलाप करता है, पर में एकत्व-ममत्व बुद्धि होने के कारण अपने आत्मवैभव को भी ठुकरा देता है, भव-भव में परिभ्रमण करता है।

Series

Samyakgyan Deepika

Category

Paintings

Medium

Charcoal on Paper

Size

24" x 30"

Orientation

Landscape

Artist

Yuvraj Patil

Completion Year

16-Mar-2019