Exhibits

Title

Ishtopdesh Gatha 03

व्रतों की सार्थकता

वरं व्रतैः पदं दैवं नाव्रतैर्वत नारकं ।

छायातपस्थयोर्भेदः प्रतिपालयतोर्महान् ।।३।।

मित्र राह देखत खडे, इक छाया इक धूप।

व्रतपालन से देवपद, अव्रत दुर्गति कूप॥३॥

अर्थ: एक बार तीन मित्र नगर से बाहर की ओर किसी कार्य से जाने लगे और बीच में ही उनमें से एक मित्र को किसी कारण से पुनः नगर में जाना पडा, अब बाकि दो मित्र उसके वापिस आने की प्रतीक्षा करने लगे – जिनमें से एक छांव में बैठा है और एक धूप में। ध्यान से देखने पर दोनों में बहुत बडा अन्तर दिखाई देता है। क्योंकि छांव में बैठकर प्रतीक्षा करने वाला व्यक्ति सुख से समय व्यतीत करता हैं और धूप में बैठकर प्रतीक्षा करने वाला दुःख से। क्योंकि प्रतीक्षा तो दोनों को ही करनी है लेकिन समझदारी स्थान चुनने में है। उसीप्रकार जब तक हमें पूर्ण सुख की प्राप्ति नहीं होती, तब तक व्रतादिक का आचरण करने वाला स्वर्गादिक में आनन्द के साथ रहता है और अव्रती पुरुष नरकादिक में दुःख भोगता है। अतः व्रतादिक का पालन निरर्थक नहीं अपितु सार्थक है।

Series

Ishtopdesh

Category

Paintings

Medium

Oil on Canvas

Size

48" x 36"

Orientation

Portrait

Artist

Manoj Sakale

Completion Year

01-May-2023

Gatha

3