Title
लोभी को धन इष्ट है
आयुर्वृद्धिक्षयोत्कर्ष हेतुं कालस्य निर्गमम् ।
वाञ्छतां धनिनामिष्टं जीवितात्सुतरां धनम् ॥१५॥
आयु क्षय धनवृद्धि को, कारण काल प्रमान।
चाहत हैं धनवान धन, प्राणनितें अधिकान ॥१५॥
अर्थ: मोहवश यह जीव धन-सम्पदा में इतना मस्त है कि इसे अपना आता हुआ काल दिखाई नहीं देता। लालसा इतनी हो जाती है कि यदि धन किसी को उधार दे तो सोचता है कि जितना काल बीतता जायेगा, उतनी ही ब्याज की आमदनी बढती जायेगी। वह यह विचार नहीं करता कि जितना काल बीत रहा है उतनी मेरी आयु भी घट रही है। स्वयं से अनभिज्ञ यह जीव धन बढाने की चाह में प्राण जाने का भय भी नहीं करता। इसप्रकार के व्यामोह का कारण होने से ऐसे धन को धिक्कार है।
Series
Category
Medium
Size
Orientation
Artist
Completion Year
Gatha