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भोग ही दुःख के कारण
आरम्भे तापकान् प्राप्तावतृप्तिप्रतिपादकान् ।
अन्ते सुदुस्त्यजान् कामान् कामं कः सेवते सुधीः ॥१७॥
भोगार्जन दुःखद महा, भोजन तृष्णा बाढ।
अंत त्यजत् गुरु कष्ट हो, को बुध भोगत गाढ़ ॥१७॥
अर्थः जिन विषय-भोगों की चाह में यह जीव भ्रमित होकर असहनीय कष्ट उठाता है उनकी वास्तविकता अति भयावह है। देह, इन्द्रिय और मन को क्लेश को कारणरूप ये भोग अस्थायी व महाकष्टदायी हैं। जब तक प्राप्त नहीं होते तब तक प्राप्ति की इच्छा रूप संताप के कारण हैं; जब प्राप्त हो जाते हैं तब अन्य भोगों की अतृप्ति के कारण हैं; और अन्त समय में जब छूटने का अवसर आता है तो छोडने रूप आकुलता के कारण हैं। अर्थात इन भोगों का आदि-मध्य-अन्त तीनों ही महादुःखदायी है। अतः ऐसे भोगों को कौन बुद्धिमान चाहेगा?
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