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शरीर दुःख का मूल
भवन्ति प्राप्य यत्सङ्गमशुचीनि शुचीन्यपि ।
स कायः सन्ततापायस्तदर्थं प्रार्थना वृथा ॥१८॥
शुचि पदार्थ भी संग ते, महा अशुचि हो जाँय।
विघ्न करण नित काय हित, भोगेच्छा विफलाय ॥१८॥
अर्थः जिस शरीर के साथ संबंध करके पवित्र से पवित्र वस्तु भी, शुद्ध से शुद्ध भोजन व रमणीक वस्त्रादिक भी मलिन व अशुचि हो जाते हैं तो विचारिये! ये शरीर पवित्र कैसे हो सकता है? वास्तव में जिस शरीर के प्रति ये जीव निरन्तर आसक्त रहता है, उसका स्वरूप ही अत्यंत घृणायुक्त है। यह शरीर मल-मूत्र का भण्डार है, इसके प्रत्येक रोम से मात्र अशुद्ध पदार्थ ही निकलते हैं तब उसको शुद्ध पदार्थों से पवित्र बनाने की आकांक्षा करना व्यर्थ ही है। इसको पवित्र करने के एक उपाय करने पर तत्काल दूसरे अपाय उठ खडे होते हैं। अतः इसका पोषण करना जीव की सबसे बडी भूल है।
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