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आत्मानुभवी का लक्षण
यथा यथा समायाति संवित्तौ तत्त्वमुत्तमम् ।
तथा तथा न रोचन्ते विषयाः सुलभा अपि ॥३७॥
जस जस आतम तत्त्वमें, अनुभव आता जाय।
तस तस विषय सुलभ्य भी, ताको नहीं सुहाय ॥३७॥
अर्थः जिन योगीजनों के ज्ञान में यथार्थ, निर्मल एवं परम पवित्र आत्मस्वरुप झलकता हो; उन्हें विषय भोगों की क्या कामना। देखो! जब मछली के अंगों को जमीन ही जला देने में समर्थ है तब अग्नि के अंगारो का तो कहना ही क्या? वे तो जला ही देंगे। उसीप्रकार जिस योगी को जैसे-जैसे आत्मा का विषय स्पष्ट होता जाता है वैसे-वैसे बिना किसी प्रयत्न के सहज प्राप्त होने वाले इन्द्रिय विषय भोग भी उन्हें प्रभावित नहीं कर पाते। यह आत्मस्वरुप का ही अतिशय समझो।
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Gatha