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Title

Pravachansaar Tika - Bol 61

जैसे कोई पुरुष तप्त लोहे के गोले द्वारा पर को घायल करने की इच्छा करता हुआ प्रथम तो स्वयं अपने को घायल करता है (स्वयं अपने ही हाथ को जलाता है), फिर दूसरे को चोट पहुँचे या न पहुँचे, कोई नियम नहीं है। वैसे ही जीव तप्त लोहे के गोले समान मोहादि परिणामरूप परिणमता हुआ प्रथम तो निर्विकार स्वसंवेदन ज्ञानस्वरुप निज शुद्ध भाव-प्राण को ही घायल करता है, फिर पर के द्रव्य प्राणों को चोट पहुँचे या न पहुँचे - नियम नहीं है ।

क्रमांक ६१. श्री प्रवचनसार टीका

Series

Vairagya Varsha

Category

Paintings

Medium

Oil on Canvas

Size

36" x 48"

Orientation

Landscape

Artist

Riaz Samadhan

Completion Year

07-Jan-2019

Bol

61