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कितने ही मनुष्य सदा महान शास्त्र समूह में परिभ्रमण करते हैं तथापि अर्थात् अनेक शास्त्रों का परिशीलन करते हैं फिर भी वे उत्कृष्ट आत्मतत्त्व को लकड़ी में शक्ति रूप से विद्यमान अग्नि समान जानते नहीं हैं।
क्रमांक ८३. श्री पद्मनन्दि पंचविंशति
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Bol