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विधि-दैव-भाग्य भुजंग के समान टेढ़ा चलता है। कभी वैभव के शिखर पर चढ़ता है तो कभी विपत्ति की खाई में गिरता है। आज श्रीमंत है तो कल दरिद्री बनकर घूमता फिरता है। जीवन पवन वेग की तरह चंचल है। धन कमाने में कष्ट, उसकी रक्षा करने में कष्ट, अंत में किसी कारण से धन का वियोग होने पर यह जीव अति कष्टित होता है। यौवन शीघ्र ही नष्ट प्राय: होता है। तथापि यह जीव संसार की नानाविध संकट-परंपरा से भयभीत नही होता। यह बड़ा आश्चर्य है।
क्रमांक ११८. श्री सुभाषित रत्न-संदोह
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Bol