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वृक्ष को पकडा हुआ पुरुष - जिसप्रकार कोई पुरुष वन में किसी पेड को पकडकर कहे कि “मुझे इस वृक्ष ने पकड लिया है, मुझे इस बंधन से मुक्त कराओ।” तो यह सुनकर कोई विश्वास नहीं करेगा क्योंकि वृक्ष किसी को बाँध सकता नहीं, ठीक उसीप्रकार यह जीव स्वयं राग-द्वेष करके भी समस्त दोष कर्मों पर डाल देता है और कहता है कि इन कर्मों ने मुझे बाँध लिया है। वास्तव में ये जड कर्म चेतन जीव को कैसे बाँध सकते हैं, जीव बंधता भी अपने परिणामों से है और मुक्त भी अपने परिणामों से होगा। इसप्रकार जो बंध-मोक्ष से भिन्न होने की इच्छा करता है वह मिथ्यादृष्टि है।
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